नशे की गिरफ्त में फंसता युवा उत्तराखंड
23 वर्ष का युवा उत्तराखंड नशे की गिरफ्त में फंसता जा रहा है। शराब , गांजा , तंबाकू , चरस तो पहले से प्रचलन में थे ही , अफीम, हीरोइन और नशीली दवाइयां भी गांव घरों और गली मोहल्लों तक फैल चुके हैं। जो युवा वर्ग को अपनी गिरफ्त में लेता जा रहा है। पढ़ाई के लिए दूसरे राज्यों में जा रहे कई युवा नशा तस्करों के चंगुल में फंसकर न केवल स्वयं नशे केआदी हो रहे हैं बल्कि नशे के समान को पहाड़ों तक पहुंचाने का कार्य कर रहे हैं। नशीले पदार्थों की सुगमता से उपलब्धता के कारण स्कूल और कॉलेज के कई बच्चे भी इसका सेवन करने लगे हैं। बागेश्वर में ही कई जगह इन बच्चों के अड्डे है जहां वे इसका सेवन करते हैं। यदि इसी तरह से नशे का यह कारोबार फलते-फूलते गया तो उत्तराखंड के विकास का सपना , सपना ही रह जाएगा।
वर्तमान में उत्तराखंड के अधिकांश परिवार नशे की समस्या से पीड़ित है। पहाड़ों में तो यह कहावत ही बन चुका है कि "सूर्य अस्त तो पहाड़ी मस्त". इस नशे में न जाने कितने महिलाओं को विधवा बना दिया और बच्चों को अनाथ। पीड़ित परिवार के अलावा पास पड़ोस के लोग भी इससे प्रभावित हो रहे हैं। इस समस्या से छुटकारा पाना तो हर जागरुक व्यक्ति चाहता है लेकिन प्रभावी कदम कोई नहीं उठा पाता।
आज सरकारों द्वारा भी गली मोहल्ले में शराब की दुकानें खोल दी गई है, जिस कारण लोगों को आसानी से शराब उपलब्ध हो जा रही है। शराब को लोगों ने सामाजिक प्रतिष्ठा का विषय बना दिया है। शादी- विवाह, तीज- त्यौहार वह अन्य कार्यक्रमों में इस शान से परोसा जाने लगा है। नशा लोगों का सुख -दुख का साथी बन चुका है. खुशी मनाने के लिए भी नशा करना और गम भुलाने के लिए भी नशा करना आम बात हो गई है। वोटिंग के समय जिस तरह से शराब का वितरण होता है उससे तो कहा जा सकता है कि सरकारें भी शराब से ही तय हो रही हैं।
नशा उन्मूलन के लिए सरकार द्वारा कानून भी बनाए गए हैं लेकिन इनका सही तरीके से पालन करना भी चुनौती बना हुआ है।
यदि वास्तव में उत्तराखंड को आगे बढ़ाना है तो समाज के जागरूक एवं गण्यमान्यों को आगे बढ़कर पहल करनी होगी। तथा समाज सेवियों, प्रशासन, मीडिया तथा युवाओं का एक ऐसा संगठन बनाना होगा जो ईमानदारी से नशा उन्मूलन के लिए कार्य कर सके। इस तरह का पारदर्शी व्यवस्था बनाने से शासन -प्रशासन की जवाबदेही भी तय होगी। और सही तरीके से इस दिशा में कार्य हो पाएगा।
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