नशा एक अभिशाप एवं समाधान के तरीके

 नशा एक अभिशाप : समाधान की संभावनाए

नशा हमारे समाज के लिए नासूर की तरह बन गया है। तमाम प्रयासों के बावजूद भी इस पर कमी आने की बजाय हमारे समाज में नशे की प्रवृत्ति बढ़ते जा रही है। घर गांव गली मोहल्ले में युवा वर्ग भी इससे ग्रसित होते जा रहा है। संयुक्त राष्ट्र संघ मादक पदार्थ एवं अपराध कार्यालय यूएनओडीसी की विश्व औषधि रिपोर्ट 2022 के अनुसार दुनिया में लगभग 284 मिलियन लोग नशीली दावाओं का उपयोग करते हैं। 2020 के आंकड़ों के अनुसार सबसे नशीला पदार्थ हेरोइन का अकेले पंजाब में 140000 करोड़ का व्यापार होता है तथा देश में 142 ऑपरेशनल ड्रग सिंडिकेट सक्रिय हैं। हीरोइन का मुख्य उत्पादक देश अफगानिस्तान की जीडीपी में 11% आय हीरोइन से होती है। अफगानिस्तान से पाकिस्तान होकर पंजाब तक और फिर पूरे देश में हेरोइन की तस्करी हो रही है, जिसने हमारे देश के युवाओं को पंगु कर दिया है । जिस युवा शक्ति को शिक्षित होकर पूरे देश के विकास में योगदान देना चाहिए वह शक्ति नशे की लत से बर्बाद होते जा रही है साथ ही चोरी, डकैती ,आपसी कलह, भ्रष्टाचार व व्याभिचार को भी बढ़ावा मिल रहा है। यदि समय रहते इसे रोका ना गया तो युवा भारत की युवा पीढ़ी देश को विकसित राष्ट्र की ओर ले जाने के बजाय विनाश की ओर ले जाने का काम करेगी कई तरह के जागरूकता कार्यक्रम चलाने के बावजूद भी नशे का कारोबार बढ़ते जा रहा सुरसा की तरह मुंह फैलाए इस समस्या से मुक्ति पाने के लिए नए सिरे से विचार विमर्श करने की आवश्यकता है। किसी भी बीमारी का इलाज तभी संभव होता है, जब उस बीमारी के कारणों का पता मालूम हो। इसलिए हमें उन कारणों को जानना होगा जो प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से नशे को बढ़ावा देते हैं। मेरी समझ से नशे को बढ़ावा मिलने का पहला कारण है , मादक पदार्थों को सामाजिक मान्यता मिलना, उनका उपयोग हमारे तीज त्योहार, शादी समारोह, व अन्य पारिवारिक व सामाजिक कार्यक्रमों में प्रतिष्ठा के रूप में परोसा जाने लगा है। जब बच्चे अपने बड़ों और संभ्रांत लोगों को इसका उपयोग करते देखे हैं तो वह भी उनका अनुसरण करने लगते हैं ।

दूसरा कारण है, बहुत से लोग गांव घरों व मोहल्ले में मादक पदार्थों की बिक्री को रोजगार के रूप में अपना लेते हैं। ये लोग समाज में अपना रुतबा रखते हैं जिस कारण इनका विरोध नहीं हो पता है । यहां तक कि सरकारें भी अपना राजस्व बढ़ाने के लिए गली-गली वह मोहल्ले में शराब की दुकान खोलते हैं। जिस कारण लोगों को शराब आसानी से मिल जाती है।

तीसरा कारण है , कानून का सही तरीके से पालन होना, कानून के तथाकथित रखवालों की मिली भगत के कारण तस्कर आसानी से नशीले पदार्थों का कारोबार करते रहते हैं ।

चौथा और सबसे अहम कारण है लोगों की उदासीनता, लोग पहले के तीन कारणों के प्रति उदासीन रहते हैं वे सोचते हैं कि इससे मुझे क्या लेना, इससे मेरे परिवार व बच्चों पर क्या असर पड़ने वाला है । लेकिन असर तो पड़ता ही है । अगर पड़ोस में आग लगेगी तो लपटें हमारे घर में भी अवश्य आएंगे। इसलिए जरूरी है कि नशे को न तो सामाजिक मान्यता दें और न ही इसकी बिक्री वह इसका उपयोग करने वालों को नजरअंदाज करें। हमें समाज में ऐसा वातावरण बनाने की आवश्यकता है जहां न नशे को, ना नशेड़ी को ना तस्करों को और न ही तस्करों का साथ देने वाले कानून के रखवाले के लिए कोई स्थान हो । साथ ही अपने परिवार के युवाओं के साथ दोस्ताना संबंध बनाए रखें , जिससे वे आपके साथ अधिक समय बिताएं और उन्हें आप पर भरोसा हो कि आप ही उसके सुख-दुख के साथी हैं।अपने घर व समाज के युवाओं के लिए ऐसा वातावरण तैयार करें कि युवा कुछ नया कर गुजरने को तत्पर हो जाए । उनमें समाज व देश के लिए मर मिटने का जज्बा पैदा हो सके ।

शासन- प्रशासन, समाज के जागरूक प्रतिष्ठित व्यक्ति, युवा वर्ग, प्रिंट एवं इलेक्ट्रॉनिक मीडिया सभी को एक मंच में आकर इसके लिए सार्थक प्रयास करने की आवश्यकता है। सोशल मीडिया में हमें ऐसे समूह बनाने की आवश्यकता है जहां नशीली पदार्थ की बिक्री व उपलब्धता तथा नशा कर रहे लोगों की जानकारी दी जा सके इसके लिए जागरुक एवं ईमानदारी से काम करने वाले लोगों का समूह बनाया जा सकता है।

कई बार हमें ही युवा वर्ग जगह-जगह पर नशा करते या नशे की बात करते दिखाई व सुनाई देते हैं लेकिन चाह कर भी सुरक्षा की दृष्टि से हम इसका विरोध नहीं कर पाते। यदि सोशल मीडिया में विश्वस्त लोगों का समूह बना हो तो वहां पर इस तरह की सूचना दी जा सकती है। और इस ग्रुप में जिम्मेदार लोगों द्वारा उठाए गए कदमों को साझा भी किया जा सकता है जिससे उनकी जवाब देही भी निश्चित हो सकेगी। इसके साथ-साथ जो लोग बुरी तरह से नशे की गिरफ्त में आ चुके हैं उन्हें कानूनी कार्रवाई के बजाय मनोवैज्ञानिक तरीके से चिकित्सा की उपचार देने की आवश्यकता होती है तो ऐसे लोगों को भी उस समूह के द्वारा मुख्य धारा में लाने के लिए पहल की जा सकती है। अंत में मैं इन पंक्तियों के साथ अपने शब्दों को विराम देता हूं -

"जज्बा कुछ कर गुजरने का,

अमल सा मुझे लगा है।

मयखाने से दूर हूं पर,

मशक्कत का नशा चढ़ गया है।"

धन्यवाद।


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